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1997 से पलवल की ज़मीन में शर्तें लिखित में उसी दिन WhatsApp पर जवाब

उत्तर प्रदेश · नेटवर्क

उत्तर प्रदेश — हम कहाँ काम करते हैं, और कैसे

ब्रज पट्टी, जेवर हवाईअड्डे का YEIDA वाला हिस्सा, और अलीगढ़ — ब्रोशर के बजाय रिकॉर्ड के सामने रखकर पढ़ा गया। नेटवर्क से, लिखित शर्तों पर, यूपी के अपने क़ानून पर।

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उत्तर प्रदेश में देख रहे हैं?

ज़िला और ज़रूरत भेजें — हम ईमानदार तस्वीर, सत्यापित स्थिति, और अपनी भूमिका (को-ब्रोक) पहले बताकर जवाब देते हैं।

हम क्या काम लेते हैं

पलवल ज़िले और नूंह (मेवात) ज़िले में ज़मीन की ख़रीद, बिक्री या रिकॉर्ड की जाँच — प्लॉट, खेती की ज़मीन, कमर्शियल और औद्योगिक टुकड़े — लिखित ज़रूरत के आधार पर।

हम क्या काम नहीं लेते

हम ऐसा कोई काम नहीं लेते जिसका अकेला मक़सद किसी मालिक पर दबाव डालकर मजबूरी में या जानबूझकर कम दाम पर बिक्री कराना हो। क़ीमत का अंदाज़ा चाहिए तो पहले गाँव और खसरा भेजिए।

आप क्या भेजें

ख़रीद: मक़सद, गाँव या इलाक़ा, ज़मीन की क़िस्म और रक़बा, बजट, समय-सीमा, और पैसे का इंतज़ाम हुआ या नहीं। बिक्री: गाँव, ज़मीन की क़िस्म और रक़बा, ज़मीन अकेले की है, साझा है या विरासत में मिली, सभी मालिक सहमत हैं या नहीं, माँगी क़ीमत, समय-सीमा और हाथ में काग़ज़। जाँच: ज़िला, तहसील और गाँव, खसरा या खेवट, सौदा किस चरण में है, और आपकी चिंता क्या है।

फिर क्या होता है

कार्य-समय (सोम–शनि 10–7) में उसी दिन जवाब — ज़रूरी हो तो कॉल कीजिए। ज़मीन ढूँढने या रिकॉर्ड जाँचने में ज़्यादा समय लगता है। शाम 7 बजे के बाद और रविवार को जवाब अगले कार्य-दिवस आता है। आपकी ज़रूरत लिखित में दोहराई जाती है और किसी भी टुकड़े की बात से पहले रिकॉर्ड की पहली जाँच होती है।

फ़ीस और काम का दायरा किसी भी काम से पहले लिखित में तय होते हैं। मौक़े पर जाना तभी होता है जब ज़रूरत लिखित में हो और रिकॉर्ड की पहली जाँच हो चुकी हो। आपकी मंज़ूरी के बिना कुछ भी हमारे दफ़्तर से बाहर साझा नहीं होता; जहाँ किसी साझेदार की ज़रूरत हो, उसका नाम पहले लिखित शर्तों में आता है।

पहले — आपको क्या चाहिए?

सबसे तेज़ — एक टैप

WhatsApp पर बताइए

भरने वाला एक संदेश खुलता है: पंक्तियों के जवाब लिखिए, कुछ भी बदलिए, फिर भेजिए।

WhatsApp पर भेजें

इस फ़ोन या कंप्यूटर पर WhatsApp नहीं है? कॉल कीजिए +91 70155 03815 (सोम–शनि 10:00–19:00 IST · रविवार बंद).

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नक़्शे से पहले

यूपी के तीन तथ्य जो ख़रीद तय करते हैं

सीमा मात्रा पर है, पहचान पर नहीं। उत्तर प्रदेश में कोई किसान-मात्र या निवास-आधारित रोक नहीं है — कोई भी व्यक्ति, ग़ैर-किसान और दूसरे राज्य का निवासी भी, हस्तांतरणीय अधिकार वाले भूमिधर से ज़मीन ख़रीद सकता है। पर §89(2) एक ख़रीदार की ख़रीद या दान से अर्जित ज़मीन को 5.0586 हेक्टेयर तक सीमित करता है, परिवार सहित जोड़कर।

मास्टर प्लान का रंग अनुमति नहीं है। कृषि भूमि तब तक कृषि रहती है जब तक धारा 80 की घोषणा न हो जाए। प्लान में रिहायशी दिखना न ज़मीन बदलता है न किसी को अनुमति देने को बाध्य करता है। "धारा 143" का हवाला देती सामग्री प्रतिस्थापित क़ानून पर चल रही है।

अधिसूचित होना बन जाना नहीं है। किसी प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्र में होने का मुख्य अर्थ है कि वहाँ विकास की अनुमति पर उसका नियंत्रण है — यह नहीं कि ज़मीन अर्जित है, विकसित है, या शहर बन रही है।